उत्तराखंड त्रासदी के सैलाब में बह गई ‘केदारनाथ’ की प्रेम कहानी

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⏱️ 9 मिनट पढ़ने का समय|📝 1,088 शब्द|📅 09 Dec 2018

पवन पाण्डेय
डेली संवाद, मुंबई

उत्तराखंड नामक अलग राज्य को बने तो तो अभी दो दशक भी नहीं हुए हैं पर वहां बद्री, केदार, गंगोत्री, यमुनोत्री की चार धाम यात्रा प्राचीनकाल से ही दुर्गम और जोखिमभरी मानी जाती रही है. पुराने ज़माने में तंगहाली तथा दुरूह परिवहन एवं संचार साधनों के चलते बुजुर्गों की अंतिम इच्छा पूरी करने निकले तीर्थयात्रियों को हार फूल, बैंड बाजे के साथ विदा किया जाता और सकुशल लौटने पर समाज में सम्मानजनक स्थान हासिल होता।

नई सदी में इस धार्मिक यात्रा का स्वरुप बदल गया है. हर गली, मोहल्ले, कॉलोनी, अपार्टमेंट में आपको दुर्गम से सुगम हुई बद्री केदार यात्रा की सेल्फी दिखाते लोग मिल जाएँगे. हिमालय की गोद में धार्मिक आस्था की समर्पित और सीमित आवाजाही जब से भीड़ भरे रोमांचक पर्यटन में तब्दील हुई है, इसका खामियाजा प्रकृति के प्रकोप के रूप में सामने आने लगा है. विकास के सामानांतर दरकते सामाजिक ताने बाने की विकृतियाँ भी दबे पाँव वहां पहुँचने लगी हैं।

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इस शुक्रवार प्रदर्शित ‘केदारनाथ’ को महज जून 2013 की उत्तराखंड त्रासदी पर केन्द्रित फिल्म समझना नादानी होगा. न ही यह लव जिहाद को परिभाषित करने का कुत्सित प्रयास है. दरअसल दो घंटे की यह दिलचस्प फिल्म अपनी सुगठित पटकथा, कुशल निर्देशन और चुस्त संपादन के चलते दर्शकों को समूची केदार घाटी में आ रहे आधुनिक बदलाव से.. वहां की समस्याओं से सीधा साक्षात्कार कराती है. लेखिका कनिका ढिल्लों और निर्देशक अभिषेक कपूर ने फिल्म को इतनी दक्षता से सामयिक और प्रासंगिक बनाया है कि दर्शक पूरे समय कल-कल बहती मन्दाकिनी की तरह कथा में प्रवाह में बहते चले जाते हैं।

फिल्म की कहानी केदारनाथ के दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर तीर्थयात्रियों की

फिल्म की कहानी केदारनाथ के दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर तीर्थयात्रियों को अपनी पीठपर लादकर ले जाने वाले पिट्ठू मंसूर (सुशांत सिंह राजपूत) की नेक नीयती और भलमनसाहत से शुरू होती है. हर तीर्थयात्री को केदारनाथ मंदिर के चौखट तक पहुँचने के बाद वह घंटी बजाकर शुक्राना अदा करता है. मंदिर के पास रामबाड़ा में रहने वाले पंडित (नितीश भारद्वाज) के परिवार में पत्नी के अलावा दो बेटियां हैं. बड़ी बेटी (पूजा गौर) सीधी सादी और धीर गंभीर है जबकि छोटी बेटी मन्दाकिनी उर्फ़ मुक्कू (सारा अली खान) आधुनिक, तेज तर्रार और फेसबुक वाले ज़माने की लड़की है।

एक अन्य रसूखदार पंडित युवक कुल्लू (निशांत दहिया) पहले मुक्कू की बड़ी बहन से और बाद में मुक्कू से ही शादी करने का अरमान पाले हुए है. पारिवारिक शंकर लॉज के संचालन में पिता और काका की मदद करने को तैयार मुक्कू को लॉज तक रोज लाने छोड़ने का काम मंसूर करता है. इस दौरान दोनों के बीच हौले हौले पनपा प्यार परवान चढ़ने लगता है. केदारनाथ में पर्यटन विकास के नाम पर बननेवाले होटल का विरोध करने के कारण मंसूर कुल्लू की आँख में खटकने लगता है।

मुक्कू और मंसूर की प्रेमकहानी पता चलता है

जब उसे मुक्कू और मंसूर की प्रेम कहानी पता चलता है तो वह उसे रास्ते से हटाने के लिये नए हथकंडे अपनाता है. रसूखदारों के दबाव में मंसूर को बूढी माँ के साथ वहां से पलायन करना पड़ता है. मुक्कू के पिता तुरत फुरत कुल्लू से उसकी शादी कराने पर अड़ जाते हैं. तभी अचानक प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखाती है. अतिवृष्टि से आये सैलाब में केदारनाथ का मंदिर अटल रहता है पर रामबाड़ा सहित समूचा समीपवर्ती क्षेत्र बह जाता है. मंसूर जान पर खेलकर मुक्कू और उसके परिवार की जान बचाता है. पर क्या बाढ़ में वह प्रेम कहानी भी बह जाती है या.. यह परदे पर देखना ज्यादा सुहाएगा।

असल में केदारनाथ लेखक और निर्देशक की फिल्म है. फिल्म में हर छोटे बड़े किरदार का चरित्र चित्रण और वस्त्र विन्यास सटीक ढंग से हुआ है. यदि फिल्म को दर्शक सर आँखों पर लेते हैं तो सफलता का श्रेय कलाकारों के अलावा फिल्म निर्माण से जुड़े हर विभाग को दिया जाना श्रेयस्कर होगा. चन्दन अरोरा के कुशल संपादन से कहानी के प्रवाह में एक भी दृश्य अनावश्यक या उबाऊ नहीं लगता. फिल्म की प्रोडक्शन वैल्यू, सिनेमाटोग्राफी और साउंड डिजाईन भी आला दर्जे की है. तुषार कांति रे ने केदार घाटी के अद्भुत लोकेशंस का नयनाभिराम फिल्मांकन किया है।

अमिताभ भट्टाचार्य के गीत, अमित त्रिवेदी का संगीत

अमिताभ भट्टाचार्य के गीत, अमित त्रिवेदी का संगीत और हितेश सोनिक का पार्श्व संगीत सहित फिल्म का वीएफएक्स प्रभावोत्पादक है. निर्देशक ने मुक्कू को मन्दाकिनी के बर्फीले जल में नहलाकर पवित्र करने, भरी बारिश में पिट्ठुओं के पलायन बाढ़ की तबाही के दारुण दृश्यों का अद्भुत फिल्मांकन किया है. अंत में हेलीकॉप्टर से बाढ़ पीड़ितों को बचाने वाला सीन लम्बा खिंच गया है. फिल्म में तीर्थयात्रियों को घोड़े और अपनी पीठ पर लादकर ले जाने वाले पिट्ठुओं की आजीविका, पर्यटन विकास के नाम पर नए होटल खोलने के निहित स्वार्थ, कट्टरपंथियों की आड़ में सदियों के सह अस्तित्व पर चोट पहुँचाने वाले प्रसंगों को रोचक ढंग से उकेरा गया है. ‘नमो नमो शंकरा..’, ‘स्वीट हार्ट..’, ‘काफ़िराना..’, ‘जाँ निसार..’ गीत कर्णप्रिय हैं।

सुशांत सिंह राजपूत को एक सधे हुए अभिनेता

सुशांत सिंह राजपूत को एक सधे हुए अभिनेता के रूप में जो उछाल एमएस धोनी से मिला था केदारनाथ में वे और ऊपर उठे हैं. सारा अली खान पहली फिल्म में आत्मविश्वास से भरी हुई हैं इसी महीने उनकी रणवीर सिंह के साथ सिम्बा आने वाली है. नितीश भारद्वाज, अलका अमीन, सोनाली सचदेव, पूजा गौर, निशांत दहिया आदि सहायक भूमिकाओं में खूब जमे हैं।

संवाद- शुक्राना देने के लिये और भी तो जगह है तुम्हारे लिये.. कैसे मर्द हो औरत की मदद करने का रिवाज़ नहीं है तुम्हारे यहाँ.. आपकी मन्दाकिनी कहीं पांडव तो नहीं खोज रही विवाह के लिये.. क्या फर्क पड़ता है फ़ोन ही तो खोया है कोई बच्चा नहीं.. तुमने आसमान पीया है कभी.. मंदिर से जुड़ी श्रद्धा और सेवा का भाव नहीं समझोगे तुम.. तीरथ और व्यापार से सबके पेट पलते हैं यहाँ.. हम तो हमेशा से आपके साथ हैं।

एकदम बीच में कहाँ से आ गए.. पंडितों की बेटी है वो समझे इतनी अकल तो तुम्हारे खच्चर में भी होगी.. चाल नागिन जैसी हो तो सपेरे उठा ले जाते हैं.. बारिश में भीग रही उस लड़की को भगाओ यहाँ से वर्ना सबके लिये मुसीबत आ जाएगी.. बगावत का सिर्फ ख्याल अच्छा होता है.. नहीं होगा ये संगम फिर चाहे प्रलय क्यूँ न आ जाए.. जला दे मुझे तीली से या भुला दे उसे.. मुक्की ने ठुकरा दिया तो इतना बड़ा घाव लगा तुम्हे। (लेखक – पवन पाण्डेय, फिल्म निर्देशक और समीक्षक हैं)

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