‘लेफ्ट-लिबरल और जिहादी इकोसिस्टम के रक्तचरित्र को समझिए’, डेली संवाद पर पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार सुरेश कुमार का आलेख

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⏱️ 11 मिनट पढ़ने का समय|📝 1,334 शब्द|📅 24 Apr 2022

'लेफ्ट-लिबरल और जिहादी इकोसिस्टम के रक्तचरित्र को समझिए', डेली संवाद पर पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार सुरेश कुमार का आलेख

सुरेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
'लेफ्ट-लिबरल और जिहादी इकोसिस्टम के रक्तचरित्र को समझिए', डेली संवाद पर पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार सुरेश कुमार का आलेखहिंदू शोभायात्राओं पर देश के विभिन्न स्थानों पर हुए पथराव और हिंसा से यह बात साबित होती है कि पाकिस्तान बनने के 75 साल बाद भी भारत में जिन्ना का द्विराष्ट्रवाद कायम है। यह विचारधारा आज भी जीवित है और इसकी बदौलत आज देश के भीतर भी कई पाकिस्तान बन चुके हैं। नव संवत्सर पर राजस्थान के करौली से शुरू हुई जिहादी हिंसा को राष्ट्रव्यापी स्वरूप देने वाला द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत यह बताता है कि किसी भी मुस्लिम बहुल इलाके में अन्य आस्थाओं के प्रदर्शन की इजाजत नहीं है।

एक टीवी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में भी यह साफ हो चुका है कि जनसंख्या के आधार पर दिल्ली समेत देश के कई इलाके पाकिस्तान बन चुके हैं जहां आम आदमी तो दूर, पुलिस का प्रवेश कर पाना भी आसान नहीं है। हिंदू त्योहारों और प्रतीक चिन्हों पर हो रहे ताबड़तोड़ हमलों के पीछे कट्टर इस्लाम की वह सोच है जो किसी भी अन्य धार्मिक मान्यता के साथ सह-अस्तित्व की इजाजत नहीं देता।

टूलकिट में अगला निशाना कौन

अलग पाकिस्तान की मांग के पीछे जिन्ना ने यही तर्क दिया था। जिन्ना का यह तर्क कितना तर्कसंगत था, इसे करौली से लेकर दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके तक हुई सांप्रदायिक हिंसा के पैटर्न को देखकर समझा जा सकता है। उपलब्ध साक्ष्य, बरामद हथियार और हिंसा की हर साजिश का मॉड्यूल उसी टूलकिट से मिलता-जुलता है जिसके आधार पर फरवरी 2020 में शाहीन बाग आंदोलन के बाद दिल्ली में दंगे कराए गए थे। इस टूलकिट में अगला निशाना कौन सा है, यह अभी किसी को नहीं मालूम।

चश्मदीद, जांच एजेंसियां और फॉरेंसिक विशेषज्ञ इस बात पर एकमत हैं कि ये दंगे अचानक हुए किसी विवाद के कारण नहीं भड़के, बल्कि इन दंगों की पूरी प्लानिंग की गई थी। हिंसा के लिए साजोसामान जुटाए गए थे और पत्थरबाजी के लिए बाहर से भी लोग बुलाए गए थे। हमलावरों का जो चेहरा सामने दिखता है, उनके पीछे कई खिलाड़ी हो सकते हैं।दंगों और खूनखराबे से देश की बहुसंख्यक आबादी को डराने की कोशिश उन लोगों द्वारा की जा रही है जो अक्सर विक्टिम कार्ड खेलते हैं और जिन्हें भारत में ‘डर’ लगता है।

आतंकवाद का कोई ‘धर्म’ नहीं होता

इन डरे हुए लोगों की बदौलत देश में यह नैरेटिव स्थापित कर दिया गया है कि आतंकवाद का कोई ‘धर्म’ नहीं होता। चूंकि दुनिया भर में विभिन्न आतंकी वारदातों को अंजाम देने वाले लोग अमूमन एक मजहब विशेष के ही होते हैं, इसलिए उनकी पहचान एक ‘विशेष समुदाय’ के तौर पर की जाती है ताकि उनके मजहब की पहचान छिपी रहे। ‘जिहाद’ भी इसी विशेष समुदाय की ‘देन’ है।

पुलिस की गिरफ्त में आए जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी और साजिशकर्ता अंसार अहमद के चेहरे पर गर्व भरी मुस्कान और उसका ‘पुष्पा’ वाला अंदाज टीवी चैनलों पर चर्चा का विषय बना हुआ है। लोग हैरत में हैं कि डरे हुए विशेष समुदाय का एक दंगाई पुलिस कस्टडी में भी इतना बेखौफ क्यों है? इस अति आत्मविश्वास के पीछे वजह क्या है? इसे जानने के लिए जिहादियों के मजबूत इकोसिस्टम को समझना होगा।

धर्मनिरपेक्ष भारत में द्विराष्ट्रवाद की अवधारणा

वर्ष 1947 के बाद जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में देश में एक ऐसा शासन तंत्र तैयार किया गया जिसमें बहुसंख्यक आबादी की छाती पर चढ़कर अलग मुस्लिम राष्ट्र ले लेने वाले समुदाय को विशेष तरजीह दी गई। विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों के जरिए धर्मनिरपेक्ष भारत में द्विराष्ट्रवाद की अवधारणा को जीवित रखा गया। कोई भ्रम बाकी न रहे, इसलिए नेहरू की पार्टी के वारिसों ने यह साफ कर दिया था कि देश के संसाधनों पर सबसे पहला हक मुसलमानों का ही है।

तुष्टीकरण की इस नीति को आज ‘गांधीवाद’ और ‘सेकुलरिज्म’ के नाम से जाना जाता है। देश की शासन व्यवस्था के हर तंत्र में इस विचारधारा की घुसपैठ है। यह इकोसिस्टम इतना ताकतवर है कि शाहबानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी बदलवा देता है। भारत में कब कौन सा विवाद खड़ा करना है, कहां दंगा करवाना है; इसका टूलकिट विदेशों में तैयार होता है जिसे देश में मौजूद उनके स्लीपर सेल अंजाम देते हैं।

सेक्युलर गैंग ने आतंकवाद का ‘धर्म’ तय नहीं होने दिया

देश के जिस सेक्युलर गैंग ने आतंकवाद का ‘धर्म’ तय नहीं होने दिया, वही इकोसिस्टम आतंकवादियों और दंगाइयों पर कार्रवाई होते ही बचाव में खड़ा हो जाता है। जहांगीरपुरी में अतिक्रमण पर बुलडोजर चलने के खिलाफ यही इकोसिस्टम खड़ा है। फरवरी 2020 में हुए दिल्ली दंगों में कई लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था जिनमें आईबी का वह युवा अधिकारी अंकित शर्मा भी शामिल है जिसे हत्या करते समय 400 बार चाकू से गोदा गया था।

दो साल पहले हुए इन दंगों में कुल 2456 आरोपी नामजद किए गए थे। इनमें से अब तक मात्र दो लोगों को दोषी ठहराया गया है। इतने बड़े पैमाने पर हुए दंगों में अब तक मात्र दो लोगों को दोषी करार दिया जाना इस जिहादी इकोसिस्टम की ताकत का सबूत है। जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य साजिशकर्ता अंसार अहमद को यही इकोसिस्टम ‘पुष्पा’ बनने का हौसला देता है।

मौलाना साद को पुलिस आज तक ढूंढ नहीं पाई

सेक्युलर गैंग के मजबूत इकोसिस्टम के कुछ और नमूने देखिए। दिल्ली की ही जामा मस्जिद के इमाम अब्दुल्ला बुखारी के खिलाफ गैर जमानती धाराओं में कम से कम 65 वारंट जारी हो चुके हैं, लेकिन न तो दिल्ली का पुलिस तंत्र आज तक उसे गिरफ्तार करने की हिम्मत जुटा पाया है और न ही अदालत अपने आदेश को तामील करवा पाई है।

तबलीगी जमात के मुखिया मौलाना साद को पुलिस आज तक ढूंढ नहीं पाई है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के समय चुनाव के दौरान और चुनाव के बाद हुई हिंदुओं की हत्या और उनके उत्पीड़न के दोषियों का क्या हुआ, यह अब तक कुछ पता नहीं चल पाया है। अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्या बहुल पश्चिम बंगाल में हिंदुओं की हत्या आम बात है। जहां तृणमूल को वोट न देने पर हिंदुओं की हत्या हो जाती हो, वहां स्थिति कितनी भयावह होगी, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

कश्मीरी हिंदुओं के जघन्य नरसंहार

पश्चिम बंगाल भारत का हिस्सा है, तब यह हाल है। बांग्लादेश और पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ क्या-क्या होता होगा, इसकी कल्पना से भी रोंगटे सिहर जाते हैं। कथित भड़काऊ भाषण देने के आरोप में हिंदू संत यती नरसिंहानंद सरस्वती, जितेंद्र नारायण स्वामी ऊर्फ वसीम रिजवी एवं कालीचरण समेत कई अन्य संतों की गिरफ्तारी हो जाती है, लेकिन एआईएमआईएम नेता एवं असदुद्दीन ओवैसी के भाई अकबरुद्दीन ओवैसी के खिलाफ अदालत को भड़काऊ भाषण के पर्याप्त सबूत नहीं मिल पाते और 10 साल बाद वह आरोपों से बरी हो जाता है।

कश्मीरी हिंदुओं के जघन्य नरसंहार के किसी भी आरोपी को आज तक सजा नहीं मिल पाई है। सजा देना तो दूर, उनका नरसंहार ही साबित नहीं हो पाया है। कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार को झूठी कहानी साबित करने की कोशिश की जा रही है जबकि गौमांस की तस्करी के एक आरोपी अखलाक की हत्या अंतर्राष्ट्रीय खबर बन जाती है। 20 कश्मीरी पंडितों की हत्या टीवी पर कबूलने वाले आतंकी बिट्टा कराटे के खिलाफ अदालत को सबूत ही नहीं मिल पाते और वह जमानत पर छूट जाता है।

हिंदुओं की टारगेट किलिंग

कश्मीरी पंडितों के साथ इस्लामी कट्टरवादियों द्वारा किए गए बर्बर अत्याचार पर बनी ‘कश्मीर फाइल्स’ को झूठी फिल्म बताने वालों में दिल्ली का मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी शामिल है। कश्मीर में 90 के दशक में शुरू हुआ आतंकवाद आज भी जारी है और वहां हिंदुओं की टारगेट किलिंग आज भी हो रही है। घाटी में लश्कर के सरगना आतंकी बुरहान वानी को गरीब मास्टर का बेटा बताया गया था।

आतंकी अफजल गुरु और याकूब मेमन के बचाव में यही इकोसिस्टम खड़ा हुआ था और आधी रात को सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खुलवा लिए गए थे। अंसार अहमद जैसे दंगाइयों का हौसला इसलिए बुलंद है। उसके बचाव में भी असदुद्दीन ओवैसी जैसा व्यक्ति खड़ा है जो जांच शुरू होने से पहले ही अंसार अहमद को क्लीन चिट दे चुका है। असदुद्दीन ओवैसी की इस धमकी में छिपे जिहादी मंसूबों को समझिए — “जब मोदी घर चले जाएंगे और योगी अपने मठ में चले जाएंगे, तो तुम्हें बचाने कौन आएगा? हम तुम्हारे जुल्मों को याद रखेंगे।” (यह लेखक के निजी विचार हैं)

















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