डेली संवाद, नई दिल्ली। World Mental Health Day 2023: ऑटिज्म, जिसे ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर (Autism Spectrum Disorder) के नाम से भी जाना जाता है। जो आनुवंशिक और एपिजेनेटिक कारणों से पैदा होने वाली एक मानसिक समस्या है। एएसडी से ग्रसित बच्चे या व्यक्ति को सही तरीके से बातचीत करने, भावनाओं व विचारों को व्यक्त करने में कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
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भारत में करीब 1.8 करोड़ लोग ऑटिज्म जूझ रहे हैं। 2 से 9 साल की उम्र के बच्चों में लगभग 1 से 1.5 प्रतिशत मामलों में एएसडी की समस्या पाई जाती है। ऑटिज्म के शिकार बच्चों को हैंडल करना पेरेंट्स के लिए बहुत ही मुश्किल होता है। ऑटिज्म को कैसे पहचानें और अगर आपका बच्चा इसका शिकार है, तो उसे कैसे हैंडल करें, इसके बारे में बता रहे हैं डॉ. ऑस्टिन फर्नांडीस। जो मुंबई में एक मनोचिकित्सक हैं।
उन्होंने बताया कि, ‘ऑटिस्टिक बच्चों को समझने और सही तरीके से हैंडल करने के लिए सबसे पहले पेरेंट्स को इन मनोविकार के बारे में समझना होगा कि इसमें बच्चों को किन तरह के चैलेंजेस का सामना करना पड़ता है।
सबसे जरूरी है कि उनकी जरूरतों को समझें और उनके साथ कैसे कम्युनिकेट करना है इसपर काम करें। ऑटिस्टिक बच्चे स्पेशल होते हैं, तो उन्हें डांटने या गुस्सा होने से कोई फायदा नहीं होने वाला। यहां आपको पेशेंस और समझदारी से काम लेना होगा।’
कम्युनिकेट करने का तरीका सीखें
ऑटिस्टिक बच्चों को समझने और बोलने में परेशानी हो सकती है, तो उनके साथ कम्युनिकेट करते वक्त बहुत लंबे-लंबे वाक्यों की जगह छोटे-छोटे शब्दों का इस्तेमाल करें, जैसे- पढ़ने के लिए रीड, खाने के लिए ईट, सोने के लिए स्लीप आदि।
टाइम दें, सब्र से काम लें
ऑटिस्टिक बच्चों के साथ पेरेंट्स को थोड़ा सब्र और समझदारी से काम लेना होता है। अगर वे किसी काम को करने में ज्यादा वक्त लेते हैं, तो चिढ़ने, गुस्साने की जगह आप उन्हें समय दें।
शेड्यूल फॉलो करें
ऑटिस्टिक बच्चे रूटीन में रहना पसंद करते हैं। सोने-उठने से लेकर पढ़ने, खेलने का एक समय निर्धारित करें इससे उनके साथ आपको भी आसानी रहेगी। अगर बच्चे की किसी तरह की थेरेपी चल रही है, तो आप भी उसे फॉलो करें। कितने भी बिजी हो, थेरेपी न मिस करें। वो जितना लोगों से घुलेंगे-मिलेंगे, उनके लिए उतना ही अच्छा होता है।
सपोर्ट करें
ऑटिस्टिक बच्चों के इंटरेस्ट को जानने की कोशिश करें। अगर उन्हें किसी खास चीज़ में रुचि है, तो रोकने-टोकने के बजाय उन्हें सपोर्ट करें। ऑटिस्टिक बच्चे भले ही सही तरीके से कम्युनिकेट नहीं कर पाते, लेकिन दिमाग से बहुत शॉर्प होते हैं।
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डॉ. नीरजा अग्रवाल, पीएचडी साइकोलॉजिस्ट ने बताया कि, इस समस्या से जूझ रहे बच्चों की देखभाल के लिए पॉजिटिव नजरिए की जरूरत होती है। इसकी शुरुआत उनके व्यक्तित्व को पहचानने और उसका सम्मान करने से होती है। उनकी देखभाल में यह ध्यान दिया जाता है कि एएसडी से ग्रसित हर एक बच्चे की जिंदगी अलग-अलग होती है।
कम्युनिकेशन में अक्सर बिना बोले होता है, जिसके लिए अतिरिक्त ध्यान और समझ की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, उन्हें सुनना और लगातार सपोर्ट करना भी जरूरी है। ये सारी चीज़ें इस समस्या से ग्रसित बच्चों के विकास में मददगार साबित हो सकते हैं।’
ऑटिज्म के लक्षण
- आंखे न मिलाना
- रुक-रुक कर बोलना या हकलाना
- बोलने में कमी या देरी
- खेल-कूद में रूचि ना दिखाना
- सामाजिक जुड़ाव की कमी
- शब्दों को दोहराना
- खुद को नुकसान पहुचाने की कोशिश करना
एक्सपर्ट से सलाह लेने में हिचकिचाएं नहीं
बढ़ती उम्र के साथ बच्चे की सही डेवलपमेंट के लिए एक्सपर्ट से सलाह लेने में बिना न हिचकिचाएं। डॉक्टर बच्चे की ग्रोथ को देखते हुए जरूरी चिकित्सा और थेरेपी सजेस्ट कर सकते हैं, जो उनके लिए बहुत ही हेल्पफुल होती है।
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