Ram Mandir: रामलला की मूर्ति का रंग काला क्यों? जानिए इसके पीछे की कहानी

Daily Samvad
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Ayodhya Ram Mandir
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⏱️ 4 मिनट पढ़ने का समय|📝 464 शब्द|📅 22 Jan 2024

डेली संवाद, अयोध्या। Ram Mandir, RamLalla: अयोध्या नगरी राम नाम से गूंज रही है। शुभ मुहूर्त में रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गई।

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श्यामल रंग में बाल स्वरूप में रामलला गर्भगृह में विराजमान हो गए हैं। अब ऐसे में हर किसी के मन में एक सवाल उठ रहा है कि श्री राम की मूर्ति काले रंग में क्यों बनाई गई है।

Ram Mandir: रामलला की मूर्ति का रंग काला क्यों? जानिए इसके पीछे की कहानी
अयोध्या में राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर श्री रामलला जी की मूरत

महर्षि वाल्‍मीकि रामायण में भगवान श्री राम के श्यामल रूप का वर्णन किया गया है। यह भी एक वजह है कि उनकी मूर्ति का रंग श्यामल है। कर्नाटक के मूर्तिकार अरुण योगीराज ने बहुत ही खूबसूरत मूर्ति की कारीगरी की है। मूर्ति का निर्माण श्याम शिला के पत्थर से किया गया है।

इस पत्थर का उपयोग करने के पीछे भी एक वजह है। श्याम शिला की आयु हजारों वर्ष मानी जाती है। ऐसे में श्री राम की मूर्ति हजारों सालों तक अच्छी अवस्था में रहेगी और इसमें किसी भी तरह का बदलाव नहीं आएगा।

जल, चंदन, रोली या दूध से भी नहीं होगा नुकसान

हिंदू धर्म में पूजा पाठ के दौरान अभिषेक किया जाता है। ऐसे में मूर्ति को जल, चंदन, रोली या दूध से भी नुकसान नहीं पहुंचेगा। जब रामलला का दूध से अभिषेक किया जाएगा तो दूध के गुण में पत्थर की वजह से कोई बदलाव नहीं होगा।

Ram Mandir: रामलला की मूर्ति का रंग काला क्यों? जानिए इसके पीछे की कहानी
राम मंदिर में विराज मान प्रभु श्री राम

उस दूध का सेवन करने पर स्वास्थ्य पर कोई गलत असर नहीं पड़ेगा। रामलला की 51 इंच की प्रतिमा खड़ी मुद्रा में है। मूर्ति का वजन 200 किलो है और इसकी ऊंचाई 4.25 फीट और चौड़ाई 3 फीट है।

रामलला पीतांबर से सुशोभित हैं और हाथों में धनुष बाण धारण किए हुए हैं। उन्होंने सोने का कवच कुंडल, करधन माला धारण की हुई है। रत्न से जड़े मुकुट का वजन 5 किलो बताया जा रहा है।

उनके मुकुट में नौ रत्न सुशोभित हैं और गले में सुंदर रत्नों की माला पहनी हुई है। कमरबंद भी सोने से बना है। आभूषणों में रत्न, मोती, हीरे शामिल हैं।

5 साल की उम्र तक बोधगम्य माना जाता

राम मंदिर में रामलला के बाल स्वरूप की मूर्ति स्थापित की गई है। हिंदू धर्म में बाल्यकाल को 5 साल की उम्र तक माना जाता है।

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इसके बाद बालक को बोधगम्य माना जाता है। चाणक्य और दूसरे विद्वानों के मुताबिक पांच साल की उम्र तक बच्चे की हर गलती माफ होती है, क्योंकि वो अबोध होता है। उस उम्र तक केवल उसे सिखाने का काम किया जा सकता है।

अयोध्या में श्री रामलला जी की प्राण प्रतिष्ठा LIVE

















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