डेली संवाद, जालंधर। Jalandhar Kidney Racket: जालंधर शहर में करीब 11 साल पहले सामने आए हाई-प्रोफाइल किडनी रैकेट मामले में एक अहम मोड़ आया है। पब्लिक प्रॉसिक्यूशन ने सेशन कोर्ट में ‘विटनेस विंडो’ दोबारा खोलने की अपील दायर की है। कानूनी सूत्रों का मानना है कि यदि कोर्ट इस अपील को मंजूरी देता है तो मामले में नामजद डॉक्टरों—डॉ. राजेश अग्रवाल, डॉ. संजय मित्तल और अन्य प्रबंधकों—की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
जालंधर (Jalandhar) के इस केस को लेकर वकीलों के मुताबिक, इससे पहले माननीय अदालत ने गवाहों की सूची बंद कर दी थी। अब अभियोजन पक्ष जरूरी गवाहों के बयान दर्ज कराने के लिए फिर से प्रयास कर रहा है। बताया जा रहा है कि इस संबंध में दो अर्जियां पहले खारिज हो चुकी हैं, लेकिन इस बार विस्तृत आधारों के साथ अपील दायर की गई है।

बिना NOC के ट्रांसप्लांट के आरोप
मामले में बड़ा नाम स्वास्थ्य विभाग की नियामक इकाई DRME के सुपरिंटेंडेंट सौदागर चंद का है। उन्होंने पुलिस को कई पन्नों का बयान दिया था, जिसमें डॉ. राजेश अग्रवाल, डॉ. संजय मित्तल और अन्य संबंधित व्यक्तियों पर बिना आवश्यक NOC के किडनी ट्रांसप्लांट करने के आरोप लगाए गए थे। आरोपों के चलते उस समय नेशनल किडनी हॉस्पिटल से जुड़े कुछ डॉक्टरों के लाइसेंस भी रद्द किए गए थे।
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DRME एक सरकारी रेगुलेटरी बॉडी है, जो अंग प्रत्यारोपण के मामलों की जांच और लाइसेंस जारी करने का अधिकार रखती है। इसलिए सौदागर चंद की गवाही को इस केस में बेहद अहम माना जा रहा है। हालांकि, बाद में जिन डॉक्टरों पर आरोप लगे, उन्हें दोबारा लाइसेंस दिए जाने की बात सामने आई, जिससे सवाल खड़े हो गए।

गवाह सूची में नाम क्यों नहीं?
पुलिस और कोर्ट दस्तावेजों के अनुसार, 2015 में जब कथित किडनी कांड का खुलासा हुआ, तब कानून के तहत DRME को संबंधित डॉक्टरों और अस्पताल की भूमिका की जांच कर रिपोर्ट देने को कहा गया था। यह भी देखा जाना था कि क्या अंग प्रत्यारोपण से जुड़े सभी नियमों का पालन हुआ या नहीं। इस संदर्भ में सौदागर चंद ने अपनी रिपोर्ट और बयान दर्ज कराया था।
हैरानी की बात यह है कि पुलिस चालान में उनका नाम तो दर्ज था, लेकिन अंतिम गवाह सूची में उनका नाम शामिल नहीं किया गया। कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि उनकी गवाही अदालत में दर्ज होती, तो केस की दिशा बदल सकती थी।

दोबारा लाइसेंस पर उठे सवाल
अब सवाल यह भी उठ रहा है कि जिन डॉक्टरों पर नियमों के उल्लंघन के आरोप लगे थे, उन्हें बाद में सर्वोदय अस्पताल में ट्रांसप्लांट का लाइसेंस कैसे मिल गया? DRME के नियमों के अनुसार, यदि कोई भी संस्थान या डॉक्टर TOHO एक्ट का पालन नहीं करता, तो उसे लाइसेंस नहीं दिया जा सकता।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विटनेस विंडो खुलती है और सौदागर चंद समेत अन्य अहम गवाहों के बयान दर्ज होते हैं, तो आरोपियों के लिए स्थिति जटिल हो सकती है। फिलहाल सभी की नजर सेशन कोर्ट के फैसले पर टिकी है, जो इस बहुचर्चित मामले में आगे की दिशा तय करेगा।








