Supreme Court: ईसाई और मुस्लिम धर्म अपनाया तो SC का दर्जा भी खत्म! धर्म परिवर्तन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने अपने फैसले में कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति की सामाजिक पहचान और कानूनी स्थिति बदल जाती है, इसलिए वह अनुसूचित जाति से जुड़े विशेष संवैधानिक लाभों का हकदार नहीं रह जाता।

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Highlights
  • आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम जिले से जुड़ा है मामला
  • ईसाई धर्म अपनाने के बाद एससी स्टेट्स खत्म
  • धर्मांतरण से अनुसूचित जाति का दर्जा खो देता
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⏱️ 4 मिनट पढ़ने का समय|📝 478 शब्द|📅 24 Mar 2026

डेली संवाद, नई दिल्ली। Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से जुड़े लोग ही अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा प्राप्त कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति ईसाई या किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करता है, तो वह अनुसूचित जाति का दर्जा खो देता है।

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि ईसाई धर्म अपनाने वाला कोई भी दलित व्यक्ति अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मिलने वाले संरक्षण का दावा नहीं कर सकता। यह फैसला आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मई 2025 के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनाया गया।

Court Order
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पादरी बन गया

मामला आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम जिले से जुड़ा है, जहां चिंथदा आनंद नामक व्यक्ति, जो मूल रूप से अनुसूचित जाति (माला समुदाय) से था, ने ईसाई धर्म अपना लिया और पादरी बन गया। चिंथदा ने आरोप लगाया था कि गुंटूर जिले के एक व्यक्ति अक्कला रामिरेड्डी ने उसके साथ जातिगत भेदभाव किया और जातिसूचक गालियां दीं। इस पर उसने SC-ST एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया था।

हालांकि जांच के दौरान सामने आया कि ईसाई धर्म अपनाने के बाद चिंथदा का अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र पहले ही रद्द किया जा चुका था। इस आधार पर हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई से इनकार कर दिया था, जिसके बाद चिंथदा ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

लाभों का हकदार नहीं

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने अपने फैसले में कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति की सामाजिक पहचान और कानूनी स्थिति बदल जाती है, इसलिए वह अनुसूचित जाति से जुड़े विशेष संवैधानिक लाभों का हकदार नहीं रह जाता।

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कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों का भी हवाला दिया। 1985 के ‘सूसाई बनाम भारत सरकार’ मामले में भी सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कहा था कि केवल आरक्षण का लाभ लेने के उद्देश्य से धर्म परिवर्तन करना संविधान की भावना के खिलाफ है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया था कि यदि कोई व्यक्ति दोबारा हिंदू धर्म में लौटता है, तो उसे SC दर्जा पाने के लिए ठोस प्रमाण और समाज की स्वीकृति आवश्यक होगी।

केंद्र सरकार से मांग

संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुसार भी केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के लोगों को ही अनुसूचित जाति का दर्जा दिया गया है। ईसाई या मुस्लिम धर्म अपनाने पर यह दर्जा समाप्त हो जाता है।

गौरतलब है कि आंध्र प्रदेश विधानसभा ने मार्च 2023 में एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से मांग की थी कि ईसाई धर्म अपना चुके दलितों को भी अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जाए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद इस मुद्दे पर बहस और तेज होने की संभावना है।

















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