RSS का पथ संचलन: विजय नड्डा ने कहा- सामर्थ्यवान होना किसी भी राष्ट्र के लिए शांति की पहली सीढ़ी

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⏱️ 6 मिनट पढ़ने का समय|📝 758 शब्द|📅 14 Oct 2018

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना दिवस पर पथ संचलन एवं शस्त्र पूजन का कार्यक्रम आयोजित
पथ संचलन के दौरान नगरवासियों ने स्वयंसेवकों पर पुष्पों की वर्षा कर किया स्वागत

दीपक गुप्ता
डेली संवाद, लुधियाना

विजयादशमी पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना दिवस पर पथ संचलन एवं शस्त्र पूजन के कार्यक्रम आयोजित किये गये। शहर के दो हिस्से सराभा भाग और सुखदेव भाग में शस्त्र पूजन एवं पथ संचलन के कार्यक्रम हुए। सराभा भाग का कार्यक्रम रोजगार्डन में आयोजित हुआ। कार्यक्रम का प्रारम्भ शस्त्र पूजन से हुआ।

सराभा भाग के संघ चालक सुदेश कपिला, विजय नड्डा (संयोजक, विद्या भारती उत्तर छेत्र), लुधियाना विभाग प्रभारक जतिंदर कुमार, लुधियाना विभाग कार्यवाह यश गिरी, सराभा भाग कार्यवाह राजेश गुप्ता ने शस्त्र पूजन किया। वाद्य यंत्रों की मधुर ध्वनियों के बीच देशभक्ति गीतों पर कदमताल करते हुए स्वयंसेवक पथ संचलन के लिए रोज़ गार्डन से रवाना हुये। रोज़ गार्डन से प्रारम्भ होकर कृष्णा नगर, आरती चौंक, घुमार मंडी बाजार, कॉलेज रोड, माया नगर के अलग-अलग मार्गों से होते हुये यह पथ संचलन पूरा हुया। इस अवसर पर कार्यक्रम में मुख्य वक्ता विजय नड्डा (संयोजक, विद्या भारती उत्तर छेत्र) शामिल हुये।

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विजयादशमी कार्यक्रम में मुख्य वक्ता विजय नड्डा ने कहा कि जब भी कोई व्यक्ति, समाज व राष्ट्र अज्ञान, आलस्य अथवा अहंकार के अधीन होकर शक्ति का सम्मान, उसका संचय और अवसर आने पर उसका उपयोग भूल जाता है तो फिर उसका पतन निश्चित होता है। शक्ति सिर्फ युद्ध के लिए ही नहीं, शांति के लिए भी आवश्यक है। दरअसल सामर्थ्यवान होना किसी भी राष्ट्र के लिए शांति की पहली सीढ़ी है।

उन्होंने कहा कि राजनीति शास्त्र के जानकार भलीभांति जानते हैं कि दो परस्पर प्रतिस्पर्धी राष्ट्रों के बीच शक्ति-संतुलन युद्ध को टालने के लिए कितना ज़रूरी होता है। जब तक दो विरोधी ताकतों के बीच शक्ति की बराबरी या बराबरी का अहसास रहता है शांति कायम रहती है। जैसे ही यह संतुलन टूटता है, शांति धराशायी हो जाती है। इस मायने में शक्ति का संधान सिर्फ शांति के लिए ही नहीं, अपितु अस्तित्वमात्र बचाये रखने के लिए भी अनिवार्य है।

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विजय नड्डा ने कहा कि इतिहास साक्षी है कि भारत ने जब शक्ति का संचयन और उसका संगठन छोड़ दिया तो शताब्दियों तक भारत माता विदेशी आक्रान्ताओं की तलवारों से लहूलुहान होकर दासता की बेड़ियों में जकड़ी रही। शक्तिपूजा का अर्थ सिर्फ सामरिक शक्ति की उपासना नहीं है। अपने व्यापक अर्थ में इसमें आर्थिक शक्ति, वैज्ञानिक शक्ति, टेक्नोलॉजी की शक्ति और नागरिकों के आत्मबल की ताकत भी शामिल है। किसी भी राष्ट्र का आत्मबल उसकी प्रजातान्त्रिक सोच, शैक्षिक संस्थानों, कला जगत के नैपुण्य, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्यों के अधिष्ठान से सीधे जुड़ा है। इसे ही आज की भाषा में ‘सॉफ्ट पॉवर’ कहते हैं। ‘सॉफ्ट’ और ‘हार्ड’ पॉवर का सही संतुलन किसी भी राष्ट्र के प्रभाव क्षेत्र को कई गुना बढ़ा देता है।

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भारतीय संस्कृति हमेशा से ही वीरता की पूजक एवं शक्ति की उपासक रही है

विजय नड्डा ने कहा कि भारतीय संस्कृति हमेशा से ही वीरता की पूजक एवं शक्ति की उपासक रही है। शक्ति के बिना विजय संभव नहीं है। इसीलिए सभी देवताओं ने कोई ना कोई शस्त्र धारण किया हुआ दिखता है। इस शक्ति का उपयोग आवश्यकता पड़ने पर ही, आसुरी शक्ति या दुष्टता का विनाश कर धर्म की स्थापना के लिए किया गया है। इसलिए सुशील शक्ति की उपासना सतत करते रहने की आवश्यकता है। यह सन्देश देने के लिए स्थान-स्थान पर शक्ति के प्रतीक के रूप में विजयादशमी के निमित्त शस्त्र पूजन करने की परंपरा भारत में है।

विजय नड्डा ने कहा कि विजयादशमी पर शक्ति पूजा महज एक परंपरा का पालन भर नहीं है। यह राष्ट्र का वर्तमान संवारने और भविष्य में आने वाले संकटों से निपटने के लिए समाज को तैयार करने का उपक्रम है। मौजूदा विश्व एक ऐसे मुकाम की ओर बढ़ रहा है, जहाँ हमारे मूल्यों, जीवन शैली, धरोहर और हमारी जीवंत सभ्यता को बचाने के लिए संघर्ष अनिवार्य होगा। इस संघर्ष के कई मोर्चे आतंकवाद और सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के रूप में कई दशकों से खुले हुए हैं। अब तक इनका सामना हमने अच्छी तरह से किया है। लेकिन आगे चलकर इनकी जटिलताओं को समझते हुए उपर्युक्त शक्ति का संधान ही इस अनवरत युद्ध में हमें विजय दिलाएगा। विजयादशमी को इस भाव से देखना और मनाना आज हमारे लिये ज़रूरी है।

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