किसान आंदोलन की तपिश से उप चुनावों में झुलसी भाजपा 

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किसान आंदोलन की तपिश से उप चुनावों में झुलसी भाजपा 

महाबीर जायसवाल
संपादक, डेली संवाद
mahabirदेश की 3 लोकसभा और 29 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजे के कई सियासी संदेश निकले हैं। पांच राज्यों के चुनाव से पहले आए इन नतीजों ने राजनीतिक दलों की धड़कनों को बढ़ा दिया है। उपचुनाव में जिसकी सत्ता उसे सियासी फायदा मिलने का ट्रेंड दिखा है और क्षेत्रीय दल अपना सियासी वर्चस्व स्थापित करने में सफल रहे हैं।

कांग्रेस और बीजेपी जैसे राष्ट्रीय दलों के लिए चुनावी नतीजे कहीं बेहतर तो कई चिंता बढ़ाने वाला रहा। हालांकि, हिमाचल में करारी हार बीजेपी के लिए खतरे की घंटी है तो कांग्रेस के लिए इसे 2022 चुनाव से पहले हौसला बढ़ाने वाला माना जा रहा है।

हार से बीजेपी में चिंता की लहर 

हिमाचल की हार से बीजेपी में चिंता की लहर दौड़ गई है। हिमाचल की एक लोकसभा सीट और तीन विधानसभा सीट पर उपचुनाव कराए गए। इन चारों सीटों को कांग्रेस ने जीत लिया है। मंडी लोकसभा सीट पर चुनाव तो मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के ही नेतृत्व में लड़ा गया। जुब्बल-कोटखाई में तो बीजेपी जमानत भी नहीं बचा पाई है।

हिमाचल के ये परिणाम इसलिए भी बीजेपी के लिए परेशानी पैदा करने वाले हैं कि सूबे में अगले साल आखिर में विधानसभा चुनाव होने हैं और इसे 2022 का सेमीफाइल माना जा रहा है। उपचुनाव के नतीजों ने ये बात भी साफ कर दी कि जिस राज्य में जिसकी सत्ता है, सीट भी उसी की होगी।

ऐलनाबाद को इनेलो का ही गढ़ माना जाता है

हरियाणा में ऐलनाबाद विधानसभा से इंडियन नेशनल लोकदल के अभय चौटाला विधायक थे। उन्होंने इस साल जनवरी में कृषि कानूनों के विरोध में इस्तीफा दे दिया था। ऐलनाबाद को इनेलो का ही गढ़ माना जाता है। उपचुनावों में अभय सिंह दोबारा यहां से जीतकर आ गए।

ऐलनाबाद में अभय सिंह की ये लगातार चौथी जीत है। उन्हें सबसे ज्यादा 43.49% वोट मिले। हालांकि, इसकी वजह किसान आंदोलन को भी माना जा रहा है। किसान आंदोलन की वजह से बीजेपी उम्मीदवार गोविंद कांडा का लगातार विरोध हो रहा था।

छह महीनों का राशन लेकर आने का दावा

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ जारी आंदोलन में पिछले साल दीवाली से दो सप्ताह बाद दिल्ली के बार्डरों पर प्रदर्शनकारियों ने डेरा डाला था। इस बार यह पर्व यहीं पर मन रहा है। शुरूआत में छह महीनों का राशन लेकर आने का दावा करने वाले किसानों को भी यह अंदाजा नहीं था कि आंदोलन इतना लंबा खिंचेगा।

फिलहाल ताे जो हालात हैं, उनमें यह आंदोलन कब तक चलेगा, इसका कुछ पता नहीं है। सरकार की ओर से भी पहल नहीं की जा रही है और किसानों द्वारा भी अपनी जिद नहीं छोड़ी जा रही है। ऐसे में माना जा रहा है कि बातचीत होनी संभव नहीं है, क्योंकि सरकार की तरफ से जो प्रस्ताव जनवरी में दिया गया था, वह किसानों द्वारा ठुकरा दिया गया था। ऐसे में बात होगी भी तो किस विषय पर।

बातचीत के लिए तैयार होने की बात तो कही जा रही है

किसान और केंद्र सरकार के बीच बातचीत के लिए तैयार होने की बात तो कही जा रही है, लेकिन पहल किसी की तरफ से नहीं हो रही। माननीय अदालत के आदेशों पर हाल ही में टीकरी बार्डर से पैदल राहगीरों और दुपहिया वाहनों के लिए रास्ता तो खुल गया है, लेकिन 15 नवंबर को दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई होगी तो उसमें दिल्ली पुलिस की तरफ से यह जवाब दाखिल करने की तैयारी की जा रही है कि उसकी तरफ से तो रास्ते खोले जा रहे थे, लेकिन किसानों ने उसका विरोध कर दिया। जबकि अब तक किसानों द्वारा रास्ते बंद करने के लिए दिल्ली पुलिस को जिम्मेदार ठहराया जा रहा था।

वैसे तो सरकार-प्रशासन और उद्यमियों द्वारा टीकरी बार्डर से चौपहिया वाहनों के लिए रास्ता खोलने का प्रयास किया जा रहा था, लेकिन आंदोलनकारी इसके लिए तैयार नहीं हुए। जब रास्ता खुलने लगा तो उन्होंने इसका विरोध कर दिया। रात में पुलिस ने 20 फीट के रास्ते के लिए बैरिकेड हटाए तो आंदोलनकारियों ने विरोध करके केवल पांच फीट तक ही रास्ता खुलने दिया। उसमें से भी एक तरफ का ढाई फीट का ही रास्ता है।

और अंत में…

ये थी उपचुनाव में किसान आंदोलन की आंच। लेकिन इनका असर आने वाले 5 राज्यों के चुनावों पर भी देखने को मिल सकता है। वो इसलिए क्योंकि ये उपचुनाव एक-दो राज्य नहीं बल्कि देश के 15 राज्यों में हुए थे। अगले कुछ महीनों में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने हैं और इन उपचुनावों को विधानसभा चुनाव से पहले का सेमीफाइनल भी माना जा रहा था। इन उपचुनाव के नतीजों से आगे की राजनीतिक दिशा तय होगी, क्योंकि इससे देश का मूड पता चल गया है।

कोरोना की दूसरी लहर के कहर के बाद हुए इन उपचुनावों में केंद्र सरकार का ज्यादा विरोध भी देखने को नहीं मिला। हालांकि, महंगाई जैसे मुद्दे थोड़े हावी दिखे। हिमाचल के सीएम जयराम रमेश ने खुद कहा कि महंगाई की वजह से उपचुनावों में हार हुई। हिमाचल में बीजेपी के लिए खतरे की घंटी भी रही, क्योंकि यहां भाजपा को जोरदार झटका लगा है। वहीं, कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया है जो 2022 से पहले उसके लिए संजीवनी की तरह काम कर सकता है।

















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