बठिंडा (पंजाब) से महेंद्र तिवारी
लाख टके का सवाल, अकाली दल का की बणना?
- बड़े बादल के बिना पहला चुनाव, गढ़ में ही घिर गए हरसिमरत और सुखबीर
- भाजपा और कांग्रेस ने बादल परिवार से जुड़े कद्दावर लोगों को बनाया प्रत्याशी
- चौथी बार मैदान में हरसिमरत, प्रकाश सिंह बादल को हराने वाले आप से कृषि मंत्री खुंडियां सामने
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कहा जाता है कि पंजाब की सियासत का दरवाजा मालवा से खुलता है और बठिंडा इसका केंद्र होता है। वजह, बठिंडा बादल परिवार का गढ़ माना जाता है। इस सीट का इतिहास बताता है कि यह जिसे अपनाता है, दिल से लगा लेता है। बादल परिवार और उनकी पार्टी से यह अपनापन यहां साफ-साफ नजर आता है। लेकिन, 2022 में बठिंडा के ही लंबी विधानसभा क्षेत्र के उलटफेर वाले चुनाव नतीजे ने बादल परिवार की नींद छीन ली है। तब परिवार के मुखिया और पांच बार के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को आम आदमी पार्टी (आप) के प्रत्याशी गुरमीत सिंह खुडियां ने हराकर तहलका मचा दिया था। खुडियां अब आप की भगवंत मान सरकार में कृषि मंत्री हैं।
बठिंडा के रोज गार्डन की खुशबूदार सुबह में मार्निंग वाक के लिए आए सेवानिवृत्त कर्मचारी रणवीर सिंह कहते हैं कि लगातार जीत के आदी बुजुर्ग बड़े बादल (प्रकाश सिंह बादल) हार का सदमा सहन नहीं कर पाए और एक साल पूरा होते-होते उनका निधन हो गया। उनका हारना बड़ा दुखद साबित हुआ। वह बहुत अच्छे नेता थे। जब वह मुख्यमंत्री थे तो एक बार कांग्रेस और दूसरी बार आम आदमी पार्टी के नेता उनके आवास पर धरना देने पहुंच गए। बड़े बादल ने उनके लिए टेंट लगवाए और उनकी बात सुनी। आज कहां हैं ऐसे लोग? इस सीट पर बादल परिवार की बहू व पूर्व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर लगातार तीन बार से सांसद हैं और चौथी बार मैदान में हैं। आप ने अब हरसिमरत के सामने उन्हीं गुरमीत सिंह खुडियां को उतार दिया है, जिन्होंने बड़े बादल को हराया था। आप ने बड़े बादल को विधानसभा में हराने के बाद हरसिमरत को लोकसभा में हराकर बठिंडा में नया इतिहास रचने के लिए पूरी ताकत लगा दी है। खास बात ये है कि बठिंडा लोकसभा क्षेत्र में जो नौ विधानसभा सीटें हैं, वर्तमान में उन सभी पर आप का ही कब्जा है।
मुश्किलें इतनी भर नहीं हैं। जैसे गठबंधन तोड़ने से नाखुश भाजपा भी अपने पुराने सहयोगी दल को सबक सिखाने पर आमादा हो गई है। उसने पूर्व आईएएस अधिकारी परमपाल कौर को प्रत्याशी बना दिया है। परमपाल वीआरएस लेकर चुनाव मैदान में आई हैं। परमपाल बादल परिवार के करीबी और अकाली दल (ब) नेता व पूर्व मंत्री सिकंदर सिंह मलूका की बहू हैं। हालांकि, मलूका ने अभी तक अकाली दल नहीं छोड़ा है। दूसरी ओर बार-बार इस सीट से मात खा रही कांग्रेस तो जैसे ताक में ही थी। उसने भी पुराने कांग्रेसी और तीन बार के विधायक जीत मोहिंदर सिंह सिद्धू की अकाली दल से घर वापसी करवाकर उतार दिया है।
किसान मुद्दे पर भाजपा से गठबंधन टूटने और पार्टी संरक्षक बड़े बादल के निधन के बाद यह पहला लोकसभा चुनाव है। शिअद मुखिया सुखबीर सिंह बादल (छोटे बादल) के सामने पूरे प्रदेश में पार्टी का पैर जमाने व फैलाने की जिम्मेदारी है। लेकिन, आप, कांग्रेस और भाजपा ने उनकी पत्नी हरसिमरत कौर की बठिंडा में जिस तरह घेराबंदी कर दी है, हरसिमरत के साथ उनकी भी चुनौती बढ़ा दी है।
इसलिए बठिंडा है बादल परिवार का गढ़
- स्वर्गीय प्रकाश सिंह बादल इसी लोकसभा क्षेत्र की लंबी विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर रिकॉर्ड पांच बार मुख्यमंत्री बने।
- बादल 1967 में पहला और 2022 में अपना आखिरी चुनाव हारे। 1969 से लेकर 2017 तक वह कोई चुनाव नहीं हारे।
- बठिंडा सीट पर 17 बार लोकसभा चुनावों में से 10 बार शिरोमणि अकाली दल (ब) का कब्जा रहा है।
इसी सीट से जीतकर हुकुम सिंह लोकसभा अध्यक्ष भी रहे
बठिंडा सीट से सांसद रहे हुकुम सिंह लोकसभा के उपाध्यक्ष और अध्यक्ष रहे। राज्यपाल भी बनाए गए।
बठिंडा चुनाव के अहम फैक्टर
- शिअद के काडर वोट बैंक में सेंधमारी की आशंका
बीवी हरसिमरत कौर 2009 में पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के बेटे रणइंदर सिंह, 2014 में पूर्व वित्त मंत्री मनप्रीत बादल और 2019 में कांग्रेस राज्य प्रमुख अमरिंदर सिंह राजा वडिंग जैसे दिग्गजों को हरा चुकी हैं। लेकिन, इस बार कांग्रेस और भाजपा प्रत्याशी के शिरोमणि अकाली दल (ब) के पृष्ठभूमि से होने से शिअद (ब) के आधार वोटों में सेंध की आशंका बढ़ गई है। आप प्रत्याशी व वित्त मंत्री गुरमीत सिंह खुडियां के सामने होने से यहां जोरदार चतुष्कोणीय लड़ाई नजर आ रही है।
- कांग्रेस को मूसेवाला परिवार का मिला साथ
बठिंडा के लिए सिद्धू मूसेवाला की हत्या एक बड़ा फैक्टर है। सिद्धू कांग्रेस से चुनाव लड़ चुके थे। काफी दिनों से चर्चा थी कि सिद्धू के पिता बलकौर सिंह उम्मीद के हिसाब से मदद न मिलने से कांग्रेस से नाराज हैं और निर्दल चुनाव लड़ सकते हैं। लेकिन, पंजाब विधानसभा में विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा और पंजाब कांग्रेस प्रधान अमरिंदर सिंह राजा वडिंग ने बलकौर को मना लिया। ध्यान रहे सिद्धू की हत्या से नाराज जनता ने संगरूर उपचुनाव में आप को हरा दिया था। बलकौर के समर्थन के एलान से कांग्रेस को बड़ी राहत मिली है। हालांकि, कांग्रेस की एक मुश्किल ये है कि वह हर चुनाव में बठिंडा से अपना प्रत्याशी बदल देती है। इस बार भी ऐसा ही किया है।
- बेअदबी मामले में कार्रवाई पर बेरुखी से सब निशाने पर
बादल शासनकाल में 2012-2017 के दौरान श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाएं अभी भी एक बड़ा मुद्दा है। बादल परिवार इस पर माफी मांग चुका है। कांग्रेस व आप दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का वादा कर बारी-बारी से सत्ता में आ चुके हैं। लेकिन बेअदबी कांड के दोषियों पर कार्रवाई पर बेरुखी को लेकर लोग कांग्रेस और आप को भी घेरते नजर आते हैं।
- बड़े बादल के नाम पर सहानुभूति भी
बठिंडा से करीब 15 किलोमीटर दूर इच्छापूर्ति हनुमान मंदिर के पास मिले सुखबिंदर सिंह कहते हैं कि बड़े बादल (प्रकाश सिंह बादल) को हराकर लोग पछता रहे हैं। बड़े बादल के न रहने से सहानुभूति है। एक जमाना था जब सरकारी अधिकारी बठिंडा तबादला होने पर रुकवाने में जुट जाते थे। इतना पिछड़ा था। आज बठिंडा में क्या नहीं है? चौड़ी-चौड़ी सड़के हैं। केंद्रीय यूनिवर्सिटी है। पॉवर प्लांट हैं। एम्स है, जहां 10 रुपये के पर्चे पर इलाज होता है। हरसिमरत कौर हमेशा बठिंडा के लोगों के बीच रहती हैं। लोगों को और क्या चाहिए? किसानों का मामला आया तो बड़े बादल ने भाजपा जैसे पुराने साथी का साथ छोड़ दिया। हरसिमरत कौर ने मंत्री पद छोड़ दिया। इसलिए बठिंडा के किसान भी साथ हैं।
- मनप्रीत का मन कहां?
पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के भतीजे व पूर्व वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल पहले शिअद ब का हिस्सा हुआ करते थे। बाद में कांग्रेस में चले गए। 2014 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस से हरसिमरत के सामने लड़ा और हार गए। 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद मनप्रीत भाजपा में शामिल हो गए। बठिंडा से करीब 35 किलोमीटर दूर गांव बादल के पास मिले परमिंदर सिंह कहते हैं कि मनप्रीत जिस दल में रहते हैं, वहां उनका मन नहीं रहता। 2019 के लोकसभा चुनाव में वह कांग्रेस में थे। लेकिन, अंदरखाने उन्होंने अपनी भाभी हरसिमरत कौर की मदद की। तब कांग्रेस के दिग्गज नेता व मौजूदा प्रदेश प्रधान अमरिंदर सिंह राजा वडिंग हरसिमरत से चुनाव हार गए। इस बार मनप्रीत भाजपा में हैं, लेकिन वह चुनाव रणनीति से लेकर प्रचार तक की कार्ययोजना से दूर हैं। ऐसे में मनप्रीत का रुख भी बहुत अहम होगा। हालांकि बीजेपी के जिला प्रधान स्वरूप चंद सिंगला ने मनप्रीत को समर्थकों सहित पार्टी के प्रचार में जुटने के लिए पत्र लिखा है। मनप्रीत के समर्थक उन्हें बीमार बताते हैं।
पूर्व गैंगस्टर भी मैदान में
पूर्व गैंगस्टर लक्खा सिधाना ने भी शिरोमणि अकलीदाल मान (अमृतसर) से चुनाव लड़ने का एलान किया है। लक्खा ने 2022 का विधानसभा चुनाव बठिंडा की मौर सीट से लड़ा था। करीब 27 हजार वोटर पाकर वह उप विजेता रहा। देखना होगा कि लक्खा चुनाव में बना रह जाता है तो किसको नुकसान पहुंचाता है।
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मुद्दे
मुफ्त की घोषणा पर से खुश नहीं पंजाब वाले
तलबंडी साबो से मंडी गेंहू ले जा रहे किसानों की बात चौंकाने वाली सामने आई। ये मुफ्त की घोषणाओं से खुश नहीं हैं। कश्मीर सिंह कहते हैं कि बिजली सस्ती होनी चाहिए, मुफ्त नहीं। सरकार के पास पैसा नहीं है, फसल का मुआवजा नहीं मिल पा रहा। सस्ती-अच्छी पढ़ाई चाहिए। नशाखोरी पर बंदी चाहिए। लड़के बर्बाद हो जा रहे हैं। मुफ्तखोरी से कर्ज बढ़ेगा और उसकी कीमत बाद में हम ही चुकाएंगे। वह कहते हैं कि सिर्फ इलाज मुफ्त होना चाहिए। यह बहुत मंहगा है। खास बात ये रही कि उनके साथी कमलवीर और हरनेक सिंह उनकी हां में हां मिलाते हैं। ढाबे पर काम करने वाले एटा के योगेश वर्मा कहते हैं कि यहां के किसान भाजपा छोड़ सब पार्टियों में बंटे हैं। बाहरी लोग राम मंदिर बनने से मोदी के साथ हैं। नशाखोरी बड़ा मुद्दा है।
पिछले दो चुनावों का हाल
2019:
हरसिमरत कौर बादल- शिरोमणि अकाली दल (ब)- 41.52 प्रतिशत वोट
अमरिंदर सिंह राजा वडिंग – कांग्रेस-39.3 प्रतिशत वोट
बलजिंदर कौर- आप- 11.19 प्रतिशत वोट
2014:
हरसिमरत कौर बादल- शिरोमणि अकाली दल (ब)- 43.73 प्रतिशत वोट
मनप्रीत सिंह बादल- कांग्रेस- 42.09 प्रतिशत वोट
जसराज सिंह -आप- 7.47 प्रतिशत वोट








