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Friday, 25 September 2026

Baba Sodal: जालंधर में श्री सिद्ध बाबा सोढल का भव्य मेला शुरू, 300 साल पुराना है इतिहास, पढ़ें बाबा सोढल जी की महत्ता

Baba Sodal: जालंधर में श्री सिद्ध बाबा सोढल का भव्य मेला शुरू, 300 साल पुराना है इतिहास, पढ़ें बाबा सोढल जी की महत्ता

डेली संवाद, जालंधर। Baba Sodal Mela Jalandhar: जालंधर स्थित श्री सिद्ध बाबा सोढल मंदिर पंजाब ही नहीं, बल्कि देश-विदेश में रहने वाले लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। हर साल अनंत चतुर्दशी के अवसर पर यहां विशाल बाबा सोढल मेला आयोजित किया जाता है। इस दौरान देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु जालंधर पहुंचते हैं और बाबा सोढल के दरबार में माथा टेककर अपनी मनोकामनाएं पूरी होने की प्रार्थना करते हैं।

बाबा सोढल मेले के दौरान पूरा जालंधर शहर धार्मिक उत्साह और भक्ति के रंग में नजर आता है। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में विशेष सजावट की जाती है। श्रद्धालुओं के लिए झूले, खान-पान और विभिन्न प्रकार की दुकानों के अलावा कई तरह के स्टॉल लगाए जाते हैं। मेले से एक दिन पहले ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचना शुरू कर देते हैं।

अनंत चतुर्दशी पर लगता है भव्य मेला

श्री सिद्ध बाबा सोढल मंदिर का मेला अनंत चतुर्दशी के अवसर पर आयोजित किया जाता है। मेले की शुरुआत भव्य हवन और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ होती है। बाबा सोढल के दर्शन के लिए सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं।

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इस धार्मिक मेले को लेकर प्रशासन की ओर से भी विशेष तैयारियां की जाती हैं। भीड़ को नियंत्रित करने, यातायात व्यवस्था बनाए रखने और श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों की तैनाती की जाती है।

करीब 1500 पुलिसकर्मी तैनात

बाबा सोढल मेले में लाखों श्रद्धालुओं की संभावित भीड़ को देखते हुए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाते हैं। प्रशासन की ओर से करीब 1500 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है।

इसके अलावा भीड़ पर नजर रखने और असामाजिक तत्वों पर निगरानी के लिए ड्रोन कैमरों का इस्तेमाल किया जा रहा है। मंदिर और मेले के आसपास सुरक्षा बल लगातार निगरानी रखते हैं, ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े।

चड्ढा और आनंद परिवार से जुड़ी मेले की पुरानी परंपरा

बाबा सोढल मेले से चड्ढा और आनंद परिवार की पुरानी परंपरा भी जुड़ी हुई है। मान्यता के अनुसार, सदियों पहले इस धार्मिक उत्सव की शुरुआत इन परिवारों से जुड़ी परंपराओं के माध्यम से हुई थी।

मेले से एक दिन पहले इन परिवारों के सदस्य मंदिर परिसर में एकत्र होते हैं। हालांकि समय के साथ यह आयोजन किसी एक परिवार या बिरादरी तक सीमित नहीं रहा। आज बाबा सोढल का मेला हर धर्म और समुदाय की साझा आस्था का प्रतीक बन चुका है।

बाबा सोढल के दरबार में मन्नत मांगने की मान्यता

बाबा सोढल मंदिर से जुड़ी मान्यता है कि जो श्रद्धालु सच्चे मन से यहां मन्नत मांगता है, उसकी मनोकामना पूरी होती है। मनोकामना पूरी होने के बाद श्रद्धालु बाबा सोढल के दरबार में आकर रोट (विशेष प्रसाद) सहित अपनी श्रद्धा के अनुसार प्रसाद चढ़ाते हैं।

मंदिर से जुड़ी एक स्थानीय परंपरा के अनुसार बाबा सोढल को चढ़ाया गया प्रसाद घर की बेटी द्वारा ग्रहण किया जाता है। बेटी के पति यानी दामाद और उसके बच्चों को यह प्रसाद देने की परंपरा नहीं होने की बात भी स्थानीय मान्यताओं में कही जाती है।

करीब 300 साल पुराना

श्री सिद्ध बाबा सोढल मंदिर का इतिहास करीब 300 वर्ष पुराना माना जाता है। मंदिर से जुड़ी लोककथाओं के अनुसार, जिस स्थान पर आज मंदिर स्थित है, वहां कभी घना जंगल हुआ करता था और पास में एक छोटा तालाब था।

कहा जाता है कि तालाब के पास एक संत कुटिया बनाकर तपस्या करते थे। इसी दौरान चड्ढा बिरादरी की एक महिला संतान प्राप्ति की इच्छा लेकर संत के पास पहुंची। संत ने उसे आशीर्वाद दिया कि उसके घर एक ऐसे बालक का जन्म होगा, जो आगे चलकर लोगों की सेवा और कल्याण का संदेश देगा।

बालक का जन्म हुआ, नाम सोढल रखा

इसके बाद एक बालक का जन्म हुआ, उसका नाम सोढल रखा गया। चार साल की उम्र में बाबा सोढल तालाब में कूद गए थे। बाबा सोढल के जीवन से जुड़ी एक प्रचलित लोककथा के अनुसार, जब वे करीब चार वर्ष के थे, तब उनकी माता तालाब के किनारे कपड़े धो रही थीं।

बालक सोढल वहां खेल रहे थे और बार-बार शरारत कर रहे थे। कथा के अनुसार, परेशान होकर माता ने गुस्से में उन्हें तालाब में चले जाने के लिए कहा। बालक सोढल अपनी माता की बात मानकर तालाब में कूद गए।

जब काफी देर तक वह पानी से बाहर नहीं आए तो उनकी माता घबरा गईं और रोने लगीं। इसी दौरान लोककथा के अनुसार, तालाब के पानी से बाबा सोढल शेषनाग के स्वरूप में प्रकट हुए।

शेषनाग के रूप में दर्शन देने की मान्यता

लोक मान्यता के अनुसार, बाबा सोढल ने अपनी माता और वहां मौजूद लोगों को आशीर्वाद दिया कि जो भी व्यक्ति इस स्थान पर सच्चे मन से मन्नत मांगेगा, उसकी मनोकामना पूरी होगी। इसके बाद वे दोबारा जल में समा गए।

इसी लोककथा के कारण बाबा सोढल को शेषनाग के स्वरूप से भी जोड़ा जाता है। मंदिर परिसर में स्थित तालाब की सीढ़ियों और गोलाकार चबूतरे को श्रद्धालु इसी धार्मिक मान्यता से जोड़कर देखते हैं।

आस्था का केंद्र है बाबा सोढल मंदिर

समय के साथ श्री सिद्ध बाबा सोढल मंदिर की प्रसिद्धि जालंधर और पंजाब से निकलकर देश-विदेश तक पहुंची। अनंत चतुर्दशी के अवसर पर आयोजित होने वाला बाबा सोढल मेला आज जालंधर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

मेले के दौरान अलग-अलग धर्मों और समुदायों से जुड़े श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। कोई मन्नत मांगने आता है तो कोई मनोकामना पूरी होने पर बाबा सोढल के दरबार में माथा टेकने और प्रसाद चढ़ाने पहुंचता है।