डेली संवाद, जालंधर। Jalandhar Kidney Racket: जालंधर शहर में बहुचर्चित किडनी रैकेट 2015 एक बार फिर नए घटनाक्रमों के चलते सुर्खियों में आ गया है। इस मामले में सर्वोदय अस्पताल (Sarvodya Hospital) से जुड़े डॉक्टर राजेश अग्रवाल, डॉ संजय मित्तल समेत अन्य डॉक्टरों और प्रबंधकों पर बिना सरकारी मंजूरी के अवैध रूप से सात किडनी ट्रांसप्लांट करने के आरोप हैं। मामला लंबे समय से अदालत में विचाराधीन है और अब इसमें तेजी आने के संकेत मिले हैं।
हाल ही में 6 अप्रैल 2026 को जज रामपाल की अदालत में जालंधर (Jalandhar) के इस केस की सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से पेश हुए अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) ने अदालत को बताया कि उन्होंने पहले ही ‘विटनेस विंडो’ दोबारा खोलने के लिए आवेदन दिया हुआ है, जिस पर अभी निर्णय लंबित है। इस आवेदन पर अगली सुनवाई 14 अप्रैल 2026 को निर्धारित की गई है। APP ने अदालत से यह भी आग्रह किया कि यह मामला पहले ही काफी लंबा खिंच चुका है, इसलिए आगे की तारीखें नजदीकी रखी जाएं ताकि जल्द सुनवाई पूरी हो सके।

चीफ सेक्रेटरी को लिखित शिकायत दी
अदालत ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए मामले की अगली सुनवाई 20 अप्रैल 2026 तय कर दी है। इस बीच प्रशासनिक स्तर पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। जानकारी के अनुसार, इस मामले को लेकर जब तत्कालीन चीफ सेक्रेटरी के.ए.पी. सिन्हा को लिखित शिकायत दी गई, तो उन्होंने प्रिंसिपल सेक्रेटरी के. राहुल को तुरंत कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। हालांकि, आरोप है कि इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, जिससे मामले की निष्पक्षता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
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मामले की सबसे अहम कड़ी डायरेक्टोरेट ऑफ रिसर्च एंड मेडिकल एजुकेशन (DRME), पंजाब से जुड़ी है। DRME किडनी ट्रांसप्लांट के लिए अधिकृत समिति गठित करता है। विभाग के सुपरिंटेंडेंट सौदागर चंद ने अपने लिखित बयान में स्पष्ट किया है कि आरोपित डॉक्टरों ने नेशनल किडनी अस्पताल में कार्यरत रहते हुए बिना अनुमति किडनी ट्रांसप्लांट किए। उन्होंने यह भी बताया कि इस पूरे अवैध नेटवर्क में किन-किन लोगों की भूमिका थी और कैसे इस रैकेट को अंजाम दिया गया।
अगली सुनवाई 14 अप्रैल 2026 को निर्धारित
सुपरिंटेंडेंट ने यह भी कहा कि पूरे मामले में ट्रांसप्लांटेशन ऑफ ह्यूमन ऑर्गन्स एक्ट (THOA) का उल्लंघन हुआ है और संबंधित सभी रिकॉर्ड उनके पास सुरक्षित हैं, जिन्हें जरूरत पड़ने पर अदालत में पेश किया जा सकता है। इन आरोपों के बाद संबंधित डॉक्टर का लाइसेंस रद्द कर दिया गया था, लेकिन बाद में उसे किन आधारों पर दोबारा बहाल किया गया, यह अब भी एक बड़ा सवाल बना हुआ है। जनता, पीड़ितों, पुलिस विभाग और कानूनी विशेषज्ञों की इस मामले पर लगातार नजर बनी हुई है।
लोगों की मांग है कि सरकार उन दस्तावेजों को सार्वजनिक करे, जिनके आधार पर आरोपों से घिरे डॉक्टर को फिर से ट्रांसप्लांट की अनुमति दी गई। गौरतलब है कि इससे पहले जज मीनाक्षी गुप्ता ने इस केस में विटनेस विंडो बंद कर दी थी और बाद में निजी कारणों का हवाला देते हुए खुद को मामले से अलग कर लिया था। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सभी गवाहों की गवाही पूरी हो जाती, तो इस मामले का सच पहले ही सामने आ सकता था। अब सभी की नजरें आगामी सुनवाई पर टिकी हैं।









