डेली संवाद, नई दिल्ली। Prostate Cancer: देश में बढ़ती उम्र के साथ होने वाली बीमारियों में प्रोस्टेट से जुड़ी समस्याएं तेजी से सामने आ रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रोस्टेट कैंसर भारतीय पुरुषों में तीसरा सबसे आम कैंसर बन चुका है, जो एक गंभीर चिंता का विषय है। चूंकि यह बीमारी मुख्य रूप से अधिक उम्र के पुरुषों को प्रभावित करती है, इसलिए इसके प्रति जागरूकता और समय पर जांच बेहद जरूरी हो जाती है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि प्रोस्टेट कैंसर (Prostate Cancer) का पता अक्सर 60 से 65 वर्ष की उम्र के आसपास चलता है। अनुमान है कि हर 125 पुरुषों में से एक को इस कैंसर का खतरा हो सकता है। इसके बावजूद, इस बीमारी को लेकर समाज में खुलकर चर्चा नहीं होती, जिससे कई तरह के मिथक और गलत धारणाएं फैलती रहती हैं।
सबसे बड़ा मिथक
सबसे बड़ा मिथक यह है कि यदि व्यक्ति खुद को स्वस्थ महसूस कर रहा है, तो उसे प्रोस्टेट कैंसर नहीं हो सकता। जबकि सच्चाई यह है कि यह कैंसर शुरुआती चरण में बिना किसी स्पष्ट लक्षण के विकसित होता है। कई मामलों में लक्षण तब सामने आते हैं जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है, जिससे इलाज कठिन हो सकता है। यही कारण है कि नियमित जांच और स्क्रीनिंग को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
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दूसरा आम मिथक यह है कि प्रोस्टेट कैंसर का इलाज बेहद दर्दनाक और कठिन होता है। हालांकि, चिकित्सा क्षेत्र में हुए विकास के कारण अब इसका इलाज काफी उन्नत और व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार किया जाता है। हर मरीज के लिए एक जैसा उपचार जरूरी नहीं होता। इलाज का तरीका मरीज की उम्र, कैंसर की अवस्था, उसकी शारीरिक स्थिति और व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के आधार पर तय किया जाता है। कई मामलों में हार्मोनल थेरेपी और टार्गेटेड दवाओं की मदद से बिना कीमोथेरेपी के भी प्रभावी उपचार संभव है।

अगर कैंसर फैल गया है, तो अब कुछ नहीं किया जा सकता
तीसरा बड़ा भ्रम यह है कि यदि कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों में फैल गया है, तो अब कुछ नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञों का कहना है कि यह धारणा पूरी तरह गलत है। आधुनिक चिकित्सा में ऐसे कई विकल्प उपलब्ध हैं जो बीमारी की प्रगति को धीमा कर सकते हैं और मरीज की जीवन गुणवत्ता को बेहतर बनाए रख सकते हैं। आज के समय में एडवांस स्टेज प्रोस्टेट कैंसर को भी एक क्रोनिक बीमारी की तरह मैनेज किया जा रहा है।
भारत में जागरूकता की कमी और नियमित स्वास्थ्य जांच की अनदेखी भी इस बीमारी के देर से पता चलने का एक बड़ा कारण है। विशेष रूप से जिन पुरुषों के परिवार में इस बीमारी का इतिहास रहा हो, उन्हें अधिक सतर्क रहने की जरूरत होती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि 50 वर्ष से अधिक उम्र के पुरुषों को नियमित रूप से प्रोस्टेट की जांच करानी चाहिए।
किस तरह के होते हैं शुरुआती लक्षण
जहां तक शुरुआती लक्षणों की बात है, प्रोस्टेट कैंसर अक्सर चुपचाप विकसित होता है। इसके शुरुआती संकेतों में पेशाब करने में कठिनाई, बार-बार पेशाब आना, पेशाब में खून आना, पेल्विक हिस्से में दर्द, या पेशाब के बहाव को नियंत्रित करने में दिक्कत शामिल हो सकते हैं। हालांकि ये लक्षण अन्य बीमारियों के भी हो सकते हैं, लेकिन इन्हें नजरअंदाज करना खतरनाक साबित हो सकता है।

कब डॉक्टर से मिलना चाहिए?
डॉक्टरों का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को पेशाब में खून दिखाई दे, या लगातार पेशाब से जुड़ी समस्याएं बनी रहें, तो उसे तुरंत विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। समय पर जांच और सही इलाज से इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है और मरीज सामान्य जीवन जी सकता है।
अंततः, बढ़ती उम्र के साथ प्रोस्टेट कैंसर का खतरा जरूर बढ़ता है, लेकिन सही जानकारी, जागरूकता और नियमित जांच के माध्यम से इससे बचाव और प्रभावी इलाज संभव है। पुरुषों को चाहिए कि वे इस विषय पर खुलकर बातचीत करें और स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें, ताकि समय रहते सही कदम उठाया जा सके।









