Mohan Bhagwat: डॉ. मोहन भागवत के शिक्षा संबोधनों का संग्रह ‘भारतीय शिक्षा दृष्टि’, पंजाबी अनुवाद को मिली नई पहचान

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डेली संवाद, नई दिल्ली/जालंधर। Mohan Bhagwat RSS New Book: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत द्वारा वर्ष 2010 से 2020 के बीच शिक्षा के क्षेत्र में दिए गए प्रमुख संबोधनों का एक महत्वपूर्ण संग्रह “भारतीय शिक्षा दृष्टि” के रूप में सामने आया है। इस पुस्तक का संकलन रवि द्वारा किया गया है, जिसमें डॉ. भागवत के उन विचारों को समाहित किया गया है, जो भारतीय शिक्षा की आत्मा, उद्देश्य और दिशा को स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत (Dr. Mohan Bhagwat) की यह पुस्तक न केवल शिक्षा जगत के लिए बल्कि समाज के व्यापक वर्ग के लिए भी एक वैचारिक दस्तावेज के रूप में देखी जा रही है। इस पुस्तक का पंजाबी अनुवाद विद्या भारती पंजाब के संपर्क विभाग द्वारा किया गया है। अनुवादित संस्करण को शीघ्र ही आकाशवाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया जा रहा है।

Rajendra Kumar
Rajendra Kumar

संगठन मंत्री राजेंद्र ने किया अवलोकन

प्रकाशन से पहले इसकी अग्रिम प्रति का अवलोकन विद्या भारती पंजाब के संगठन मंत्री राजेंद्र ने किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि यह पुस्तक भारतीय शिक्षा परंपरा को समझने और उसे वर्तमान समय की आवश्यकताओं से जोड़ने का एक सार्थक प्रयास है। पंजाबी भाषा में इसका प्रकाशन पंजाब सहित उत्तर भारत के शिक्षा प्रेमियों, शिक्षकों और विचारकों तक इन विचारों को पहुंचाने में सहायक सिद्ध होगा।

“भारतीय शिक्षा दृष्टि” पुस्तक को देश के नीति निर्धारकों और जनप्रतिनिधियों का भी समर्थन मिला है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस पुस्तक के लिए अपने संदेश में कहा है कि विद्या भारती के विद्यालय राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत नवीन पीढ़ी के निर्माण का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि विद्या भारती केवल औपचारिक शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि लोक शिक्षण के माध्यम से समाज को जागृत और सुसंस्कृत करने की दिशा में भी प्रभावी भूमिका निभा रही है।

dharmendra pradhan
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दिशाबोध और प्रेरणा का स्रोत

धर्मेंद्र प्रधान के अनुसार यह पुस्तक शिक्षा की त्रिमूर्ति- विद्यार्थी, अभिभावक और आचार्य के लिए समान रूप से उपयोगी है। इसके साथ ही यह शिक्षा नीति से जुड़े अधिकारियों, शैक्षणिक प्रबंधकों, बुद्धिजीवियों और शिक्षाविदों के लिए भी दिशाबोध और प्रेरणा का स्रोत बनेगी।

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शिक्षा मंत्री ने अपने संदेश में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह नीति भारत केंद्रित दृष्टिकोण पर आधारित है। इसके प्रभावी क्रियान्वयन में लगे शिक्षा क्षेत्र के सभी घटकों के लिए “भारतीय शिक्षा दृष्टि” की विषयवस्तु मार्गदर्शक सिद्ध हो सकती है। पुस्तक में निहित विचार नीति और व्यवहार के बीच की दूरी को पाटने में सहायक होंगे और शिक्षा को भारतीय मूल्यों से जोड़ने का आधार प्रदान करेंगे।

अनुराग ठाकुर का संदेश

पूर्व केंद्रीय मंत्री और हमीरपुर से भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने भी इस पुस्तक के लिए अपना संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि विद्या भारती भारत की संस्कृति और परंपरा को आगे बढ़ाने में विशिष्ट योगदान दे रही है। अनुराग ठाकुर ने अपने संदेश में भारत की प्राचीन और सनातन शिक्षा परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि वसुधैव कुटुंबकम, अहिंसा, विश्व शांति और साहचर्य जैसे सिद्धांतों पर आधारित यह परंपरा आक्रमणों और षड्यंत्रों के बावजूद सुरक्षित रही है।

स्वतंत्रता के बाद भी इसे कमजोर करने के प्रयास हुए, लेकिन राष्ट्रनिष्ठ संतों और मनीषियों ने इसे सहेजने और अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। उनके अनुसार विद्या भारती आज इस प्राचीन शिक्षा परंपरा को साधारण जनमानस तक प्रभावी ढंग से पहुंचा रही है और “भारतीय शिक्षा दृष्टि” उसी प्रयास का सशक्त उदाहरण है।

Banbir ji
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प्रचारक प्रमुख बनवीर सिंह ने कहा

इस पुस्तक की अग्रिम प्रति का अवलोकन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उत्तर क्षेत्र प्रचारक प्रमुख बनवीर सिंह ने भी किया। उन्होंने कहा कि डॉ. मोहन भागवत के शिक्षा संबंधी विचार केवल भाषणों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे एक दीर्घकालिक दृष्टि प्रस्तुत करते हैं, जिसमें शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का मूल आधार माना गया है।

पुस्तक में संकलित संबोधन यह स्पष्ट करते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, सामाजिक उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक चेतना का विकास भी है। कुल मिलाकर “भारतीय शिक्षा दृष्टि” एक ऐसी पुस्तक के रूप में सामने आ रही है, जो भारतीय शिक्षा के मूल दर्शन को आधुनिक संदर्भों में समझने का अवसर देती है।

पुस्तक का पंजाबी अनुवाद

पंजाबी अनुवाद के माध्यम से यह विचारधारा और व्यापक समाज तक पहुंचेगी। शिक्षा जगत से जुड़े लोगों के साथ-साथ आम पाठकों के लिए भी यह पुस्तक भारत की शिक्षा परंपरा, उसकी चुनौतियों और संभावनाओं को समझने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली मानी जा रही है।



















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