Skip to content

Jalandhar News: 'भारतीय शिक्षा दृष्टि' मकाले मानसिकता से बाहर लाती है - देशराज

Share Facebook X WhatsApp Telegram Email
View in ePaper
डेली संवाद, जालंधर। Jalandhar News: डीएवी विश्वविद्यालय जालंधर के ऑडिटोरियम में आयोजित कार्यक्रम में विद्या भारती के राष्ट्रीय महामंत्री देशराज जी ने भारतीय शिक्षा दृष्टि पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा केवल ज्ञान देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कौशल, संस्कार और संस्कृति का संतुलित विकास करती है। उनका मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करना और समाज में सकारात्मक मूल्य और नैतिकता को स्थापित करना है। श्री देशराज जी ने बताया कि भारतीय शिक्षा दर्शन पंच कोष आधारित है, जिसमें शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और आत्मा का समग्र विकास शामिल है। यह दृष्टि विद्यार्थियों को केवल अकादमिक ज्ञान नहीं देती, बल्कि उन्हें जीवन जीने की कला, समाज के प्रति दायित्व और व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय चरित्र के सद्गुण सिखाती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि शिक्षा का उद्देश्य युवाओं में स्वाभिमान, श्रम की श्रद्धा, आत्मीयता और बुराइयों से दूर रहने की प्रवृत्ति विकसित करना है। [caption id="attachment_106273" align="aligncenter" width="1200"] indian-education-vision-skill-culture-holistic-development indian-education-vision-skill-culture-holistic-development[/caption]

शिक्षा अब केवल रटने पर आधारित नहीं

उन्होंने 2020 की नई शिक्षा नीति का भी उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा अब केवल रटने पर आधारित नहीं है, बल्कि कौशल-आधारित, मूल्य-आधारित और समग्र विकास पर जोर देती है। इससे युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति और विरासत पर गर्व करते हुए वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर होगी। श्री देसराज जी ने कहा कि मातृभाषा पर आधारित शिक्षा से विद्यार्थियों में स्वाभिमान और सांस्कृतिक जुड़ाव पैदा होता है, जो सभ्य समाज के निर्माण में सहायक होता है।

यह भी पढ़ें: Japnoor Travels के सतनाम सिंह पर 45 लाख रुपए ठगी का आरोप, किसानों ने दफ्तर घेरा

कार्यक्रम में डीएवी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मनोज जी, विद्या भारती पंजाब के कोषाध्यक्ष विजय ठाकुर और प्रांत संपर्क प्रमुख सुखदेव वशिष्ठ भी उपस्थित रहे। कुलपति डॉ. मनोज ने श्री देसराज जी का स्वागत किया और कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम युवा पीढ़ी में सकारात्मक सोच और भारतीय संस्कृति के प्रति जागरूकता पैदा करने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। इस अवसर पर श्री देसराज जी ने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षा केवल आर्थिक लाभ के लिए नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह देश की संस्कृति, मूल्यों और राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर समाज के सर्वांगीण विकास का आधार बने।