डेली संवाद, अमृतसर (रमेश शुक्ला 'सफर')। Amritsar Langoor Mela 2026: पंजाब के अमृतसर स्थित श्री दुर्ग्याणा तीर्थ के बड़े हनुमान मंदिर में रविवार, 11 अक्टूबर 2026 को शारदीय नवरात्र के पहले दिन प्रसिद्ध लंगूर मेला शुरू हो गया। दस दिनों तक चलने वाले इस धार्मिक मेले में बच्चे लाल गोटेदार पोशाक, सिर पर शंकु आकार की टोपी और हाथ में छोटी छड़ी लेकर मंदिर पहुंच रहे हैं। इस अनोखी वेशभूषा के कारण यह मेला देश-विदेश के श्रद्धालुओं के बीच खास पहचान रखता है।
लंगूर मेले की सबसे खास बात इसकी धार्मिक मान्यता है। श्रद्धालुओं के अनुसार, यह परंपरा संतान प्राप्ति की मनोकामना और मनोकामना पूरी होने के बाद निभाए जाने वाले संकल्प से जुड़ी है। नवरात्र के दौरान परिवार अपने बच्चों को लंगूर का बाना पहनाकर बड़े हनुमान मंदिर में दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए लाते हैं।
संतान प्राप्ति की मन्नत से जुड़ा है लंगूर मेला
अमृतसर के बड़े हनुमान मंदिर में लंगूर का बाना पहनने की परंपरा श्रद्धालुओं की गहरी आस्था से जुड़ी हुई है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जिन दंपतियों को संतान प्राप्ति की इच्छा होती है, वे भगवान हनुमान के समक्ष अपनी मनोकामना रखते हैं।
मान्यता है कि मनोकामना पूरी होने के बाद कुछ परिवार नवरात्र के दौरान अपने बच्चे को लंगूर की वेशभूषा पहनाकर मंदिर में माथा टेकने और पूजा-अर्चना करने लाते हैं। परिवार इस परंपरा को अपनी श्रद्धा, संकल्प और भगवान हनुमान के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम मानते हैं।
यह धार्मिक विश्वास पर आधारित परंपरा है। इसे किसी चिकित्सकीय परिणाम या संतान प्राप्ति की गारंटी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
बच्चे क्यों पहनते हैं लाल गोटेदार पोशाक?
लंगूर मेले में बच्चों की विशेष वेशभूषा सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र रहती है। बच्चे लाल रंग की गोटेदार पोशाक, सिर पर शंकु के आकार की टोपी और हाथ में छोटी छड़ी लेकर मंदिर पहुंचते हैं।
इस पारंपरिक वेशभूषा में बच्चे भगवान हनुमान के दर्शन करते हैं और परिवार के साथ धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। श्रद्धालु इस रूप को हनुमान भक्ति और अपनी धार्मिक परंपरा से जोड़कर देखते हैं।
लाल पोशाक और विशेष परिधान इस मेले की पहचान बन चुके हैं। नवरात्र के दौरान मंदिर परिसर में ऐसे बच्चों और उनके परिवारों की भागीदारी से धार्मिक माहौल बना रहता है।
दस दिनों तक लंगूर बने बच्चे किन नियमों का पालन करते हैं?
लंगूर मेले में भाग लेना केवल विशेष पोशाक पहनने तक सीमित नहीं है। इस परंपरा के दौरान बच्चे और उनके परिवार नवरात्र के दस दिनों तक धार्मिक मर्यादाओं का पालन करते हैं।
परंपरा के अनुसार, इस अवधि में कई परिवार सात्विक भोजन करते हैं, नियमित पूजा-अर्चना करते हैं और धार्मिक नियमों का ध्यान रखते हैं। कुछ परिवार बच्चों को जमीन पर सुलाने जैसे नियमों का भी पालन करते हैं।
हालांकि, इन नियमों का पालन हर परिवार में एक जैसा नहीं होता। यह उनकी पारिवारिक परंपरा और धार्मिक मान्यताओं पर निर्भर करता है।
दशहरे के अगले दिन पूरी होती है परंपरा
लंगूर मेला शारदीय नवरात्र के पहले दिन शुरू होता है और विजयादशमी के अगले दिन विशेष धार्मिक विधि के साथ संपन्न होता है। परंपरा के अनुसार, अंतिम दिन बच्चे बड़े हनुमान मंदिर में माथा टेकते हैं।
इसके बाद उनका लंगूर वाला चोला उतारा जाता है। इस तरह दस दिनों तक निभाई जाने वाली धार्मिक परंपरा पूरी होती है। परिवार इस अनुष्ठान को अपनी मनोकामना, श्रद्धा और संकल्प से जोड़कर देखते हैं।
श्री दुर्ग्याणा तीर्थ की खास पहचान है लंगूर मेला
अमृतसर का श्री दुर्ग्याणा तीर्थ पंजाब के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। यहां नवरात्र के दौरान आयोजित होने वाला लंगूर मेला शहर की विशिष्ट धार्मिक परंपराओं में से एक है।
हर साल श्रद्धालु अपने बच्चों के साथ मंदिर पहुंचते हैं और इस परंपरा में भाग लेते हैं। बच्चों की लाल पोशाक, पारंपरिक टोपी और हाथ में छड़ी मेले को अलग पहचान देते हैं।
लंगूर मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं की आस्था, पारिवारिक संकल्प और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का प्रतीक भी है। नवरात्र के इन दस दिनों में बड़े हनुमान मंदिर में भक्तिभाव और धार्मिक गतिविधियों का विशेष माहौल देखने को मिलता है।